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30 सितम्बर 2020
30 सितम्बर 2020

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होम्योपैथी का गौरवशाली इतिहास, कोरोना पर भी हो आजमाइश

Posted on: Wed, 06, May 2020 10:34 PM (IST)
होम्योपैथी का गौरवशाली इतिहास, कोरोना पर भी हो आजमाइश

कोविड 19 जिसे सामान्य भाषा में कोरोना वायरस कहा जाता है जिसने दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। चिकित्सा विज्ञान अभी तक इसके बचाव का कोई टीका नहीं खोज पाया है। इसलिए सभी देश इससे घबराए हुए हैं। चीन के वुहान शहर से चला यह कोरोना वायरस दुनिया के 200 से ज्यादा देश में पहुंच गया है और जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। इसने किसी को नहीं छोड़ा है चाहे वह अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली आदि जैसे विकसित देश हों या भारत, पाकिस्तान, चिली, पेरू, इजरायल आदि जैसे विकाशशील देश। यह हर देश मे तबाही मचा रहा है यंहा तक कि बड़े बड़े देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं भी इसके सामने बौनी पड़ रहीं हैं।

दुनिया भर मेँ कोरोना वायरस से लगभग 36 लाख 50 हजार से अधिक लोग संक्रमित पाये गये हैं और लगभग 2 लाख 80 हजार लोग मौत का शिकार हो गये हैं। भारत मे लगभग 43000 हजार से अधिक लोग इससे संक्रमित पाये गए हैं और लगभग 1400 लोगों की मृत्यु हुई है। संतोष की बात यह है कि सरकार के त्वरित प्रयासों के कारण देश मे संक्रमण यूरोपीय देशों की तरह नहीं फैला है। इसकी गंभीरता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित किया है। जब महामारियों एवं संक्रामक रोगों से बचाव एवम उपचार की चर्चा होती है तब होम्योपैथी की चर्चा होना स्वाभाविक है क्योंकि होम्योपैथी का इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।

होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के आविष्कारक डॉ हैनिमैन के समय से लेकर आज तक 200 वर्षों में होम्योपैथी में महामारियों के बचाव एवं उपचार में महत्वपूर्ण भमिका अदा करने के प्रमाण उपलब्ध हैं। डॉ हैनिमैन ने अपने जीवनकाल में ही वर्ष 1799 में स्कारलेट फीवर से बचाव के लिए बेलाडोना औषधि का प्रयोग कर सफलता प्राप्त की थी। पर्सियन सरकार ने भी स्कारलेट फीवर से बचाव के किये बेलाडोना का प्रयोग कर सफलता प्राप्त की थी। डॉ हैनिमैन ने स्वयं 1831 में एशियाटिक कॉलरा के बचाव एवं उपचार में कैम्फर,क्यूपरममेट तथा वेरेटरम एल्बम का प्रयोग कर सफलता प्राप्त करने का जिक्र किया है। डॉ वोगरवोनिंगहसन ने 1849 में यूरोपीय देशों में फैले एशियाटिक कॉलरा का बचाव एवं उपचार इन्हीं होम्योपैथिक दवाइयों से किया था।

जोहान्सबर्ग के डॉ टाइलर स्मिथ एवम शिकागों के डॉ ग्रिमर ने 1850 में पोलियोमिलिटिस के उपचार के लिए लथायर्स का प्रयोग अनेक रोगियों में किया था। देश में वर्ष 1996 एवम 2015 में डेंगू से बचाव के लिए इपिटोरियुम पर्फ का प्रयोग कर इस पर प्रभावी नियंत्रण प्राप्त किया गया था। जापानी इन्सेफलाइटिस से रोकथाम के लिए वर्ष 1999 में आंध्र प्रदेश ने भारतीय चिकित्सा पद्धतियों एवं होमियोपैथी विभाग भारत सरकार के सहयोग से अभियान चलाया गया था जिसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए थे। इसके अतिरिक्त समय-समय पर स्वाइन फ्लू, चिकुनगुनिया, मीजल्स, चिकेनपॉक्स, मम्प्स, हूपिंग कफ, एलो फीवर आदि संक्रामक रोगों से बचाव एवं उनके उपचार में होम्योपैथिक दवाइयां अपनी कार्यकरिता साबित कर चुकी हैं।

इनके प्रयोग से इन संक्रमणों पर नियंत्रण प्राप्त करने में काफी सहयोग प्राप्त हुआ था। होम्योपैथिक औषधियों के प्रयोग के फलस्वरूप मृत्यु दर में कमी आई तथा जटिलताएं भी कम हुईं। कोरोना वायरस की वैश्विक महामारी के संकट में होम्योपैथी को याद करना केवल प्रासंगिक ही नहीं बल्कि आज के दौर मे महत्वपूर्ण भी है। महामारियों के बचाव एवम उपचार में होम्योपैथी की प्रभाविकता के अनेक प्रमाणिक उदाहरण उपलब्ध होने के बावजूद भी होम्योपैथी का पूरी तरह उपयोग नहीं हो पा रहा है जबकि लोगों की जान बचाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। कोरोना वायरस के संक्रमन के कारण पूरी दुनिया दहशत में है।

हर देश अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए हर संभव उपाय कर रही है यहां तक की पारंपरिक पद्धतियों का भी सहारा ले रही हैं परंतु अभी अपने देश में सरकार होमियोपैथी पर पूरा भरोसा नहीं कर पा रही है। होम्योपैथी के संबंध में यह तर्क दिया जा रहा है कि होम्योपैथी में कोरोना के उपचार के प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह रोग पहली बार हुआ है औऱ होम्योपैथी में रोगी के लक्षणों के आधार पर उपचार होता है। इसलिए प्रमाण किसी भी पद्दति के पास नहीं है फिर भी उपचार किया जा रहा है।

होम्योपैथी में संक्रामक रोगों के उपचार की असीमित संभावनाएं निहित है बस जरूरत है उसको प्रयोग में लाकर आजमाने की। होम्योपैथिक औषधियों के काम करने का तरीका एकदम सरल है और जब आधुनिक विकित्सा विज्ञान अपने हाथ खड़ा कर रहा हो ऐसी स्थिति में होम्योपैथी अच्छा विकल्प साबित हो सकती है। इस महामारी से निपटने के लिये समय आ गया है कि चिकित्सा पद्दतियों की आपसी प्रतिस्पर्धा से बाहर निकल कर एक समन्वित तरीका अपनाया जाए जिसमे होम्योपैथी को भी शामिल किया जाए। प्रस्तुति- डॉ अनुरूद्ध वर्मा एमडी (होम्यो) वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक, डॉ. वी. के. वर्मा, वरिष्ठ आयुष चिकित्साधिकारी, जिला चिकित्सालय बस्ती, उ.प्र