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27 सितम्बर 2022
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खराब हो गया है कांग्रेस का सेल्फ र्स्टाटर

Posted on: Fri, 19, Aug 2022 6:04 PM (IST)
खराब हो गया है कांग्रेस का सेल्फ र्स्टाटर

कांग्रेस का सेल्फ स्टार्टर खराब हो गया है। यह तब चालू होती है जब बीजेपी धक्का लगाती है और बीजेपी ने तमाम स्वायत्त संस्थाओं को कांग्रेस के पीछे धक्का देने के लिये लगा रखा है। जैसे ही ये संस्थायें खास तौर से प्रवर्तन निदेशालय धक्का लगाता है तुरन्त कांग्रेस कम से कम एक महीने के लिये स्टार्ट हो जाती है। पूरे देश में धरना प्रदर्शन, ज्ञापन आदि कार्यक्रम होने लगते हैं। लेकिन चुनाव आते हैं तो सारी मेहनत बेकार चली जाती है।

जब कांग्रेस की पोजीशन यूपी में अच्छी होने वाली थी तब नेतृत्व ने समाजवादी पार्टी से गंठबंधन करके खुद को कई साल पीछे कर लिया। ऐसा लगता है कांग्रेस का थिंक टैंक कमजोर हो गया है, यही कारण है जब निर्णय लेने का वक्त आता है तो कांग्रेस नेपथ्य में चली जाती है, और जिनसे मुकाबला है वे सभी फैसले काफी पहले कर लेते हैं। वर्तमान स्थिति ये है कि शहर से लेकर गांव तक कांग्रेस कमजोर नजर आ रही है। ग्रामीण स्तर पर अब संगठन में उतना दम नही रहा।

तमाम ऐसे लोगों की निष्ठा भी सरकने लगी है जिनकी पिछली दो पीढियों ने पूरा जीवन कांग्रेस की टोपी में गुजार दिया। नेतृत्व के निर्देश पर घोषित बड़े से बड़े कार्यक्रमों में कांग्रेसजनों की संख्या दहाई अंक पार नही कर पाती। वह भी कई गुटों में रहती है। आपसी सिर फुटव्वल तो इस कदर है कि कहीं युवा विंग को 50 प्लस वाले कांग्रेसी फूटी आंख से नही देखना चाहते तो कहीं युवा विंग ने 50 प्लस वाले नेताओं से दूरी बनाकर रखा है। विभिन्न कारणों से बंटे कांग्रेसी अपनी हनक खोते जा रहे हैं। जिला कमेटियों की अंदरूनी कलह दूर करने तथा पार्टी के कार्यक्रमों को सफलता पूर्वक सम्पन्न कराने के लिये पार्टी नेतृत्व ने प्रभारियों की नियुक्ति की है।

लेकिन वे भी जनपद मुख्यालयों पर पुहंचकर उन्ही कांग्रेसियों के सुर में सुर मिलाते हैं जिनकी वजह से सब कुछ ठीकठाक नही चल रहा है। अभी हाल ही में अगस्त क्रांति के अवसर पर नेतृत्व के निर्देशानुसार प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में 9 से 15 अगस्त तक आजादी की गौरव यात्रा निकालने का निर्देश मुख्यालय से जारी हुआ था, लेकिन यूपी के 75 जिलों में मुश्किल से 20 जिलों में ये यात्रा पूरी हुई। कमोवेश यही स्थिति सभी जिला मुख्यालयों की है। बस्ती जनपद की बात करें तो यहां भी 75 किमीं के स्थान पर कांग्रेसजन 15 किमी. भी गौरव यात्रा को नही ले जा पाये।

यहां वर्षो से जिलाध्यक्ष रहे अंकुर वर्मा ने 07 जुलाई को इस्तीफा दे दिया है, तबसे यह पद रिक्त है। नेतृत्व के निर्देश पर प्रभारियों का कई बार आना जाना हुआ लेकिन उन्हे कोई जिलाध्यक्ष नही मिला। कांग्रेस अध्यक्ष अंकुर वर्मा इससे पहले भी एक बार इस्तीफा दे चुके हैं। हालांकि उस बार इस्तीफा स्वीकार नही हुआ था, मान मनौव्वल के बाद उन्होने फिर जिम्मेदारी संभाल ली थी। लेकिन इस बार उन्हे कोई मनाने नही आया और करीब डेढ़ महीने से कांग्रेस बगैर जिलाध्यक्ष के चल रही है।

नई ताजपोशी को लेकर आपसी सहमत नही है, संभवतः इसीलिये नेतृत्व जिलाध्यक्ष नही मनोनीत कर पा रहा है। अंकुर वर्मा बस्ती से 2017 में नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके हैं। वे सेकण्ड फाइटर रहे। यहां से भाजपा की रूपम मिश्रा चुनाव जीत गयीं थी। अंकुर वर्मा को चुनाव हराने के लिये जाति विशेष ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। इस बार फिर वे नगरपालिका चुनाव में भाग्य आजमाने की सोच रहे हैं लेकिन भितरघात का उन्हे अच्छा अनुभव हो चुका है।

कायस्थ मतों के दम पर वे वैतरणी पार करना चाहते हैं। सूत्रों की माने तो कायस्थ वोटों के ठेकेदारों ने उन्हे समझा दिया है कि कांग्रेस के बैनर से आये तो नुकसान उठाना पड़ेगा, चुनाव जीतना है तो बीजेपी से आइये या फिर निर्दल। उनके खांचे में कोन सा फैक्टर फिट बैठता है ये वही जानें लेकिन कांग्रेस के बारे में यह कहना अतिशयोक्ति नही होगा कि उसका सेल्फ स्टार्टर खराब हो गया है। नेतृत्व को चाहिये जमीनी स्तर पर काम शुरू करे और शहरों की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस की पैठ मजबूत करें। जिलाध्यक्षों का चयन जिला कमेटियों के साथ समन्वय स्थापित कर किया जाये। क्योंकि ऊपर से थोपे गये जिलाध्यक्षों को प्रायः स्थानीय कमेटियां बर्दाश्त नही कर पातीं।


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